धूप के पाँव
थके अनमने से
बैठे सहमे।
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उगने लगे
कंकरीट के वन
उदास मन।
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नहीं पनपा
बरगदी छाँव में
कभी पादप।
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मरने न दो
परंपराएँ कभी
बचोगे तभी।
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सहम गई
फुदकती गौरैया
शुभ नहीं ये
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मेघ उमड़े
धरती भी उमगी
फसल उगी।
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मिलने भी दो
राम और ईसा को
भिन्न हैं कहाँ।
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बिना पानी की
घूम रही है चक्की
पिसेंगे सब।
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चींटी बने हो
रौंदे तो जाओगे ही
रोना-धोना क्यों?
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सूर्य के पाँव
चूमकर सो गए
गाँव के गाँव।
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मैं न बोलूँगा
बोलेंगी कविताएँ
व्यथा मन की।
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यूँ ही न बहो
पर्वत-सा ठहरो
मन की कहो।
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पतंग उड़ी
डोर कटी, बिछुड़ी
फिर न मिली।
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बूढ़ा सूरज
झेलेगा कब तक
तम के दंश।
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निगल गई
सदियों का सृजन
क्रोधित धरा।
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मुढ़ैठा बाँधे
अकड़ा खड़ा चना
माटी का बेटा।
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गोद में बैठा
सूरज खरगोश
उछल भागा।
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थका सूरज
ढहा देगा फिर भी
तम का दुर्ग।
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गौरैया आती
सिखाती कितनों को
अन्दाज़ नया।
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खेत की मेड़
सिसके चुपचाप
छिला वदन।
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पीटता नभ
बिजली के कोढ़े से
रोता बादल।
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रोज ले आती
गौरैया घास-फूस
फेंक देती माँ।
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गुस्सैल नभ
दिखाता लाल आँखें
रोता बादल।
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साँझ होते ही
बैठ गया आसन पे
ऋषि सूरज।
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युगों से खड़े
ऋषि बरगद जी
बने तपस्वी।
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गन्ध के बोरे
लाता है ढो-ढोकर
हवा का घोड़ा।
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-डॉ॰जगदीश व्योम